लेखक के विषय में

नारायणी मित्तल, संग्रहकर्ता

धन्यवाद! मेरे प्रभु से इस प्यारे जीवन के लिए, सुमति और अच्छे विचारों से अवगत कराने के लिए। मेरा परम सौभाग्य है कि लोकगीतों का संग्रह करने की भावनाये जागी। हम सभी जानते हैं कि लोकगीतों के रचनाकार और रचनाकाल दोनों से ही हम परिचित नहीं हो पाते। कारण यह है कि लोकगीत सामान्यतः अनपढ़ और रूढि़यों से बंधे किसी एक व्यक्ति की कृति नहीं होते वरन् वे समय-समय पर परिवर्तित होते रहते हैं तथा अनाम रचनाकारों की सामुहिक रचना होते हैं। यों तो एक संस्कार के समय गाने के लिए हजारों गीत होते हैं जिनको पढ़कर, गाकर उस समय के प्रत्येक रीति-रिवाज का पता चल जाता है।

ये केवल गीत ही नहीं बल्कि लोकमानस के द्वार पर खड़े ऐसे द्वारपाल हैं जो भारतीय संस्कारों की रक्षा करते हैं। आधुनिकता ने भी हमें कई स्तरों पर संवेदनाओं से दूर कर दिया है। हम व्यक्तिमुखी होते जा रहे हैं। हम सामूहिक तथा सामाजिकता से कट रहे हैं। दूसरों के दुःख-सुख से हमारे रिश्ते टूट रहे हैं। लोकगीत सामुहिकता का सहज पाठ है। सामाजिकता की उल्लासपूर्ण पूजा है।

आईये मैं नारी के व्यक्तित्व से परिचित कराती हूँ। नारी अपने मनोभावों को अपने मन के उद्धगारों को कैसे व्यक्त करें, क्योंकि वो हर समय तो घर के काम-काजों में व्यस्त रहती हैं। हाँ कभी-कभी काम करते समय अवश्य गुनगुना लेती हैं पर जब किसी का विवाह होता है या और कोई मांगलिक कार्य होता है, तो वो अपने आपको सबसे आगे रखती है। गायन, वादन, नृत्य तथा हस्तकला नारी के जीवन का अभिन्न अंग हैं। परन्तु सभी कलाओं में गायन का स्थान प्रमुख है।

लोकगीतों की अपनी एक मौखिक परम्परा है। यह एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी तक निरन्तर चलती रहती है। सामाजिक जीवन में हर्षोंल्लास को व्यक्त करने के लिए अनेक मांगलिक अवसर आते हैं। हर्ष और आनन्द के इस वातावरण से प्रभावित होकर मैंने उन सभी मांगलिक अवसर पर गाये जाने वाले गीतों का संग्रह किया है, जिन्हें विभिन्न नामों से भी सम्बोधित किया जाता है। जैसे देवी-देवताओं के गीत, जच्चा पालना, झुंझना, बन्ना, घोड़ी, सेहरा, बन्नी, सुहाग, जयमाला, विदाई गीत तथा खोरिये में गाये जाने वाले हास्यपद गीत। इन अवसरों पर महिलायें गीतों द्वारा अपना हर्ष व्यक्त करती हैं। हास्य व्यंग्य का ऐसा माहौल स्थापित कर लेती हैं और अपने गीतों के रस की वर्षा में सुनने वालों को नहला देती हैं।

इन गीतों कि विशाल सम्पत्ति की रक्षा करना और इनका विकास करना हम सभी का कर्तव्य है। हमारे सिद्धान्त और उनकी मान्यतायें इतनी अधिक गहरी हैं कि नई पीढ़ी को उनके प्रति आकर्षित करना आज की आवश्यकता है ताकि वे इस कला को समझ सकें और अपनी इस सांस्कृतिक देन पर गर्व कर सकें।

बहिनों के सम्मुख इस संग्रह को प्रस्तुत करने का मेरा उद्देश्य यही है कि आधुनिक व्यस्त जीवन मे सभी महिलायें प्रत्येक अवसर के गीत स्मरण नही रख पाती, तब उन्हें कुछ लिखित सामग्री की आवष्यकता होती हैं जिनके माध्यम से वह अपने मन की अभिलाशा पूर्ण कर सकें।

यह लोकगीत हमारी संस्कृति की धरोहर हैं। इसलिए लोकगीतों के इन मोती-मणिकों को माला में पिरोकर प्रस्तुत किया है, इस प्रयास को आप के हाथों में सौपते हुए मुझे अपार खुशी की अनुभूति हो रही है।

आषा है मेरा यह प्रयास आपको रूचिकर लगेगा एवं महिला समाज में इसे समुचित प्रोत्साहन मिलेगा।

नोटः-

  • 1. जिस गीत का एक अन्तरा दिया गया हैं। उसके बाबुल, चाचा, जीजा, भैया, फूंफा, नाना, मामा एवं मौसा लगाकार उसी प्रकार आगे गायें।
  • 2. जिस गीत में आभूशण के नाम आते हैं। उसमें क्रमषः शीश का झूमर, कान के कुण्डल, हाथ की घड़ियाँ, पैर की पायल व बिछिये का नाम लेकर आगे गायें।
  • 3. जिस जगह 2 लिखा हो उस लाईन को 2 बार गायें।
  • 4. ऊपर के अन्तरे की तर्ज पर ही पूरा-पूरा गीत गाया जायेगा।
  • 5. भात के गीतों को समधन करके गा सकते हैं। इसी प्रकार समधन के गीतों को भातन करके भी गाया जा सकता है ।